विश्वस्तरीय डिजीटलाईज्ड लाईब्ररी है लाडनूं का ‘वर्द्धमान ग्रंथागार’ जहां दुर्लभ पांडुलिपियों के साथ हर विषय के ग्रंथों व शोधपत्रों का सागर समाया है

लाडनूँ, 30 मई 2024। विश्व के प्रत्येक विषय की अध्ययन सामग्री को संजोए हुए दुर्लभ ग्रंथों, पांडुलिपियों, विश्वस्तरीय पुस्तकों के साथ प्राचीन भारतीय विधा, जैनविद्या, प्राकृत व संस्कृत तथा धर्म और दर्शन आदि से सम्बंधित पुस्तकों का अथाह सागर है लाडनूं स्थित जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) का केन्द्रीय पुस्तकालय ‘वर्द्धमान ग्रंथागार’। विभिन्न शोधार्थियों, प्राध्यापकों, स्वाध्याय करने वालों और रूचि रखने वाले लोगों के लिए यह पुस्तकालय आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पूर्ण सुव्यवस्थित ढंग से संजोई गई 75 हजार से अधिक पुस्तकों और 406 थीसिस, 6650 पांडुलिपियों और विभिन्न जर्नल्स, पत्र-पत्रिकाओं आदि से सम्पन्न यह पुस्तकालय शोधवेताओं के लिए बहुत ही उपयोगी बना हुआ है। इस केन्द्रीय पुस्तकालय में यहां उच्च सुविधाओं से संयुक्त 120 से अधिक सीट वाला अध्ययन केन्द्र और रीडिंग हाॅल व रीडिंग गैलरी के अलावा अलग-अलग विषयों के 3 रीडिंग रूम लाईब्रेरी के अन्दर बनाए गए है। यहां फोटोकाॅपी एवं स्कैनर की सुविधा, वाई-फाई इंटरनेट की सुविधा, 29 सीसी टीवी कैमरे, 3 कम्प्यूटर लैब, तकनीकी विभाग आदि प्रत्येक अध्येता विद्यार्थी, पाठक, संकाय सदस्य आदि के लिए उपलब्ध है।

अत्याधुनिक डिजीटल सुविधाओं से सम्पन्न

यह पूर्ण कम्प्यूटराईज्ड व डिजीलाईज्ड होने के साथ ही वाई-फाई सुविधा, सीसी टीवी एवं अन्य आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न क्षेत्र की यह पहली लाईब्ररी है। यहां विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों के लिए विशेष रूप से निर्मित बुक ट्रांजेक्शन के लिए सोल 3.0 सॉफ्टवेयर की सुविधा उपलब्ध है, जिसके द्वारा ओपेक (ऑनलाईन पब्लिक एक्सेस केटेलोग) सभी पाठकों के लिए मौजूद है। डेलनेट नामक पुस्तकालय नेटवर्क से भी यह वर्द्धमान ग्रंथागार जुड़ा हुआ है। डेलनेट विकासशील पुस्तकालय नेटवर्क है, जो भारत में 33 राज्यों में 7700 से अधिक संस्थानों को जोड़ने वाला प्रमुख संसाधन साझा करने वाला पुस्तकालय नेटवर्क है। इसी प्रकार यह केन्द्रीय पुस्तकालय नेशनल डिजीटल लाईब्रेरी एनडीएल की संस्थागत सदस्यता भी रखता है। जैविभा विश्वविद्यालय के इस केन्द्रीय पुस्तकालय को प्रत्येक स्थान के लिए उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाईन व्यवस्था करते हुए इसका संस्थागत डिजीटल कोष भी स्थापित किया जाकर समृद्ध बनाया जा रहा है।

75 हजार से अधिक ग्रंथों का अद्भुत संग्रह

अतिसम्पन्न ग्रंथ-धरोहरों के साथ इस जैन विश्वभारती संस्थान विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय में कुल 75 हजार से अधिक पुस्तकों का संग्रह मौजूद है। ई-जर्नल, शोध पुस्तकों, शोध-पत्रों, रिसर्च जर्नल, सीडी वगैरह का संकलन 60 हजार से अधिक है। जैन हैरिटेज के लिए यहां अलग से पुस्तक कक्ष बनाया गया है। यहां 6650 हस्तलिखित पांडुलिपियों का अद्भुत संग्रह स्थित है तथा दुर्लभ पांडलिपियों के संरक्षण व उनकी सुरक्षा के लिए केन्द्र स्थापित किया गया है, जिसमें पूरे क्षेत्र की मंदिरों, उपाश्रयों, आश्रमों, संतों, पुजारियों, घरों, आदि में मिलने वाली पांडुलिपियों को संग्रहित व संरक्षित किया गया है।

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