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संस्थान में संस्कृत समारोहोत्सव 2025 पर परिसंवाद आयोजित

संस्थान में संस्कृत समारोहोत्सव 2025 पर परिसंवाद आयोजित

अंग्रेजी थोपने के प्रयासों के बावजूद संस्कृत अधिक मजबूत होकर उभरी- डा. रामदेव साहू,

लाडनूँ, 08 अगस्त 2025। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के प्राकृत-संस्कृत विभाग के तत्वावधान में संस्कृत समारोहोत्सव- 2025 का आयोजन किया गया। संस्कृत समारोहोत्सव के दौरान बुधवार को ‘संस्कृत संस्कृतिश्च’ विषय पर एक परिसवंाद का आयोजन किया गया। प्रो. जिनेन्द्र जैन की अध्यक्षता में आयोजित इस परिसंवाद कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डा. रामदेव साहू ने अपने सम्बोधन में संस्कृत के आधुनिक साहित्य के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य अत्यंत विशाल है। संस्कृत प्राचीन भाषा है और चिरंतन भाषा है। इसका विशाल साहित्य आज भी उपलब्ध है। उन्होंने वेदों की प्राचीनतम ज्ञानराशि मौजूद होने की बात कहते हुए बताया कि वेदों में वेदों में प्रक्षेप नहीं है, जबकि इनके बाद के ग्रंथों में प्रक्षेप मिलते हैं। उन्होंने वैदिक संस्कृत ग्रंथों ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक ग्रथ आदि के बारे में बताते हुए लौकिक संस्कृत का प्रथम ग्रंथ वाल्मीकि रामायण को बताया और कहा कि इस लौकिक संस्कृत में ग्रंथ रचनाएं दीर्घकाल तक चलती रही। यह 16वीं सदी तक सुव्यवस्थित चलती रही। इसके बाद 17वीं सदी में अंग्रेजों के आगमन और उनकी नीतियों से बाधित हुई। 1835 में मैकाले शिक्षा नीति को लागू किया तो पूरी भारतीय संस्कृति को ही नष्ट करने का प्रयास किया गया। अंग्रेजी करे थोपना शुरू कर दिया गया। इसके बाद फिर संस्कृत व संस्कृति को लेकर नई चेतना पैदा हुई और उसे ही संस्कृत का पुनर्जागरण काल कहा जाता है। 1956 में 19वीं शताब्दी के रचित आधुनिक साहित्य का प्रकाशन प्रो. हीरालाल शास्त्री ने किया। यह 1866 से आधुनिक संस्कृत का रचनाकाल रहा। तभी संस्कृत पत्रकारिता भी शुरू हुई। 1860 के बाद स्वतंत्रता पूर्व तक 60 संस्कृत पत्रिकाएं प्रकाशित हुई थी।

संस्कृत समस्त प्रकार की शुद्धि पर बल देती है

राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत विद्वान प्रो. दामोदर शास्त्री ने अपने सम्बोधन में संस्कृत की उत्पति और उसका महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि भारत के सम्मान के दो मानक हैं, संस्कृति और संस्कृत। भारत धर्मप्रधान देश है, यहां आत्मशुद्धि पर जोर दिया जाता है। यहां मन की शुद्धि के लिए योगशास्त्र, वाणी की शुद्धि के लिए व्याकरण शास्त्र और शरीर की शुद्धि के लिए आयुर्वेद की रचना की गई। ये तीनों ही शुद्धि के माध्यम हैं। उन्होंने आज के समय में भाषा सम्बंधी अशुद्धियों की चर्चा करते हुए बताया कि ऐसे में संस्कृत का प्रचार एक चुनौती है। ही में अंग्रेजी भाषा की घालमेल और संस्कृत शब्दों के अशुद्ध प्रयोग को उन्होंने बताया कि इससे एक नई अशुद्ध भाषा का जन्म हो रहा है। परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए प्रो. जिनेन्द्र जैन ने कहा कि भाषा का आदान-प्रदान हर युग में होता आया है और वह समाज में प्रचलन में आ जाता है। हमें भाषा से जुड़ाव के मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने संस्कृत दिवस की तरह ही प्राकृत दिवस भी मनाए जाने की आवश्यकता बताई।

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में समस्त ज्ञान-विज्ञान समाहित

परिसंवाद में प्रो. नीरज शर्मा उदयपुर ने संस्कृत को भारत-विद्या का प्रवेश द्वार बताया और कहा कि भारत विद्या के बहुत सारे आयाम है और संस्कृत उनका मार्ग है। उन्होंने समस्त विषयों से सम्बंधित भारत के प्राचीन वैज्ञानिकों का विवरण प्रस्तुत करते हुए उनकी विधाओं और रचित संस्कृत ग्रंथों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, खगोल शास्त्र, वनस्पति विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, आहार विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, वास्तु शास्त्र का शिल्प विज्ञान, वस्त्र उद्योग, रत्न विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि के प्राचीन ग्रंथों और उनके रचियताओं के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के समक्ष आज के अध्येता दांतों तले अंगुलि दबा लेते हैं। प्रो. सुषमा सिंघवी ने जैन आचार्यों, मुनियों, संतों द्वारा रचित विपुल संस्कृत साहित्य की जानकारी दी। उन्होंने इन पर शोध की आवश्यकता बताई। विपुल ने संस्कृत को सामथ्र्यवान भाषा बताया। मुमुक्षु छवि ने संस्कृत का महत्व प्रतिपादित किया। कार्यक्रम में मुमुक्षु बहनों ने संस्कृत गीतिका प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुमुक्षु बहिनों के मंगलाचरण से किया गया। इस अवसर पर प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, प्रो. रेखा तिवाड़ी, प्रो. बीएल जैन, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास, डाॅ. लिपि जैन, डाॅ. बलबीर सिंह चारण, डाॅ. स्नेहलता, डाॅ. सुनीता इंदौरिया, डाॅ. ईर्या जैन, डाॅ. रविन्द्र सिंह एवं अन्य शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

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