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शिक्षा विभाग के तत्वावधान में ‘‘कोविड-19 के दौरान तनाव-प्रबंधन’’ पर राष्ट्रीय सिम्पोजियम का आयोजन

तनाव से मुक्ति का उपाय है- व्यस्त रहें, मस्त रहें: प्रो. शर्मा

राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों ने कहा, रेतीले गर्म क्षेत्रों में रहने वालों का इम्युनिटी पावर बहुत अधिक

लाडनूँ, 25 मई 2020। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के शिक्षा विभाग के तत्वावधान में ‘‘कोविड-19 के दौरान तनाव-प्रबंधन’’ विषय पर एक दिवसीय ई-राष्ट्रीय सिम्पोजियम का आयोजन ऑनलाईन किया गया। कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की प्रेरणा से आयोजित इस सिम्पोजियम में बुलंदशहर के शिकारपुर स्थित श्यामलाल पीजी काॅलेज के प्राचार्य प्रो. अशोक शर्मा एवं आगरा के एमबीएस काॅलेज के शिक्षा संकाय के प्रो. विनोद कुमार शर्मा मुख्य वक्ता रहे। प्रो. अशोक शर्मा ने अपने वक्तव्य में बताया कि मन की छोटी सोच और वैर की मोच से व्यक्ति आगे नहीं बढ सकता है। कोविड-19 से आधे लोग तो बिना बीमारी, बिना क्वारंटाईन और बिना आइसोलेशन के ही तनावग्रस्त हो रहे हैं। वे टीवी, मोबाईल या रेडियो पर कोरोना संक्रमितों की संख्या देखते रहते हैं, लेकिन वे यह नहीं देखते-विचारते कि कितने लोग स्वस्थ्य होकर डिस्चार्ज भी हो रहे हैं। यह निराशावादी सोच मन में भय पैदा करती है और तनाव बढा रही हैं। इस देश के लोगों में इम्युनिटी पावर बहुत अधिक है, क्योंकि यहां के लोग मेहनती, पसीने में रहने वाले, गर्म पानी पीने वाले, रेतीले मैदान व मिट्टी में रहने वाले हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि एक 12 वर्षीया बालिका मात्र 7 दिनों में 1200 किमी की दूरी में साईकिल से चक्कर लगाकर आ सकती है। उस देश में कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। उन्होंने बताया कि हम बच्चों की किलकारी, चिड़ियों को दाना, पशुओं को चारा और गरीबों को भोजन बांटेंगे तो हमें तनाव नहीं हो सकता है। बनावटी हंसी के स्थान पर वास्तविक हंसी के वातावरण में जीने से तनाव कभी भी हमारे समीप नहीं आ सकता है। अनर्गल सोच, विचार व चिंता में रहने के कारण तनाव हमारे ऊपर हावी हो जाता है और हम बेवजह ही परेशान, चिंताग्रस्त व तनावग्रस्त हो जाते हैं। प्रो. शर्मा ने कहा कि बिखरी हुई झाड़ू कभी कचरा साफ नहीं कर सकती, बल्कि वह स्वयं कचरा बन जाती है। इसी प्रकार हमारे विचार बिखरे, उखड़े व अतार्किक हुये तो वे हमें तनावग्र्रस्त बनाते हैं। हमें इनसे बचने का प्रयास करना चाहिये। इसके लिये अपनी नियमित दिचर्या सही रखें, योग, प्राणायाम, ध्यान व आसनों के साथ-साथ पुस्तकों का स्वाध्याय करें। इससे तनाव व चिंता स्वतः ही खत्म हो जायेंगे। खाली दिमाग शैतान का घर माना गया है, इसलिये अपने आपको हमेशा व्यस्त रखने और मस्त रहने की कला सीखनी चाहिये।

स्वाध्याय व आत्मसंयम से तनावमुक्ति संभव

प्रो. विनोद कुमार शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि कोरोना का रोना रोने से ही हम तनावग्रस्त हो रहे हैं। दिन भर इसी का राग गाते रहने से ही हमें दुःख प्राप्त होता है। मन में विचारों का आना स्वाभाविक है, लेकिन हरदम उनका गाना गाते रहने और टीवी ही देखते रहने से तनाव का कारण बनता है। समय का सदुपयोग, स्वाध्याय, आत्मनियंत्रण, आत्म-साक्षात्कार से तनाव को दूर किया जा सकता है। छिद्रान्वेषण, नकारात्मक सोच, निष्क्रियता और निष्प्रयोजन वाले व्यक्ति में तनाव अधिक रहता है। हमें विकृत विचारों से बचना होगा, तभी स्वस्थ और खुशहाल रह सकते हैं। प्रारम्भ में विभागाध्यक्ष प्रो. बीएल जैन ने अतिथियों का स्वागत किया और अपने उद्बोधन में बताया कि वैश्विक महामारी कोविड-19 महामारी के आगमन के बाद से ही दुःख, हानि, अशुभ, प्रतिकूल सोच तथा बुरे विचारों के अधिक प्रवाह से व्यक्ति में तनाव होना स्वाभाविक है। तनाव के कारण व्यक्ति का जीवन दुर्भर हो जाता है। जबकि जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, अच्छा-बुरा आदि चलता ही रहता है। जीवन के इस चक्र में कभी नकारात्मक पक्ष प्रबल हो जाता है तो कभी सकारात्मक पक्ष प्रबल बन जाता है। यह एक संघर्ष है, जिसमें कोई वीर बन कर उतरता है और कोई कायर बन कर लड़ता है। कोई हंस कर परिस्थितियों को स्वीकार करता है तो कोई रोते हुये समय को बीताता है। लेकिन इतना तो तय है कि सभी को यह संघर्ष करना होता है, तो इसके लिये हमें कोविड-19 की संकट की अवस्था को साहस, सहनशीलता, धैर्य, आत्मविश्वास के साथ योद्धा बन कर संघर्ष करना चाहिये, यही विजय का मंत्र है। इससे पूर्व डा. अमिता जैन ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कोविड-19 की प्रतिकूल परिस्थितियों में तनाव पर विजय पाने के लिये विविध युक्तियों से अवगत करवाना और जीवन शैली को संयमित करके तनावमुक्त जीवन जीने के उपायों पर विचार करना ही कार्यक्रम का मुख्य ध्येय है। कार्यक्रम का संचालन मोहन सियोल ने किया।

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